Monday, 3 October 2016

Manjhi - Indian

सर रख कर जिसकी गोदी में वर्षो,
सुख दुःख में हंसा व रोया है।
आज बिलखती बेटी के संग वो
हाँ उसी की लाश को ढोया है।।
चार कंधो क्या सुकून क्या होता है
जो इक काँधे ने दिलाया है।
मांझी, मांझी ही बन बैठा देखो
आज जिन्दा लाशों को इसने रुलाया है।।
न ही कोई विद्रोह ह्रदय में
न उम्मीद कोई ज़माने से है।
वादा सात जन्मों का था जो
बस अपना फ़र्ज़ निभाने से है।।
उठा देगा माझी वो सुसुप्त प्रसाशन
जो है गहरी नींद में यहां खोया है।
जब-2 व्यस्था की नींद लगी है,
तब-2 किसी अपने ने अपना खोया है।।
पुत्री के अश्क़ लहू के छलके जो मीलों
जमी को पल-पल वहाँ जलाएंगे।
घाव ह्रदय का और पदचिन्ह वो गहरे
'निरंजन' आसमा से नजर हैं आएंगे।।
~Ram Niranjan Raidas #NiranjanPoems

Sunday, 3 April 2016

फ़िक्र

फ़िक्र

तुझे ही मेरी फ़िक्र है वरना ,
वो देख !,
सारा शहर मोहब्बत को मुझसे और
मुझको महब्बत से जानता है !
तू खुद नाप ले मेरी मुहब्बत का पैमाना !
मेरे शहर के हर मयखाने का प्याला ,
तेरा नाम जानता है !
अब तो मेरी रूह भी वाकिफ है तेरी वफाई से ,
पर ये दिल मेरे अंदर होके भी मेरी बात मानता है !
मैं भी चाहता हूँ तुझे भुला दू तेरी ही तरह !
पर क्या करूँ ,
कुछ इस कदर बस गयी है तू मुझमे ,
की मेरा रोम रोम मुझे अब तुझसे पहचानता है !
सिर्फ एक तू ही है जिसे मेरा प्यार दिखा
वरना सारा शहर मुझे तेरे आशिक़ के नाम से जानता है !
तेरे सिवा मेरे पास कुछ था खोने को ,
पर तेरे जाने के बाद ये शराब का प्याला मुझे संभालता है !
मेरी हालत अब उस शीशे सी रह गई है फकत !
टूट भी जाऊँ सौ टुकड़ो में मगर ,
हर टुकड़ा तेरे अक्स को खुद का गवाह मानता है !

‪#‎आदित्य_प्रताप_सिंह 'अनु'


हजारो टूटते हुए दिलो का गवाह हूँ ,
तभी तो लिखने को इतना बेतरतीब और मुहब्बत से बेपरवाह हूँ ।

Wednesday, 10 February 2016

मैं दिवाली क्यों मनाऊँ ?

मैं दिवाली क्यों मनाऊँ ?

जो घोर तम है मेरे मन में ,
आश ऐसी क्यों जगाऊँ
मिटटी के दिए जलाकर ,
मैं दिवाली क्यों मनाऊँ ?
झूठी मुस्कान से परेशां
इस दिल को कब तक मैं बहलाऊँ !!
कोरी खुशियों को दिखाकर ,
'खुश हूँ मैं' ये क्यों दिखाऊं ?
मैं दिवाली क्यों मनाऊँ ?
अरमान मेरे वो जलाकर
कर रही घर रोशन अपना
गैर-संग वो कितनी खुश है
कह दो तो ,
इस बात पर मुह-मीठा कराऊँ !!
पर मैं दिवाली क्यों मनाऊँ ?
अन्धकार -रंजित ह्रदय में,
तेरी पूजा अब भी क्यों है !!
मुझको तो नफरत है तुझसे ,
पर दिल को कैसे मैं मनाऊँ ..!
मैं दिवाली क्यों मनाऊँ ?
तू तो मेरी है नहीं पर,
दिल को कैसे मैं बताऊँ
मेरा होके भी तेरा है !
तुझसे वापस कैसे लाऊँ !!
मेरे संग खुश-राज है ,
मैं दिवाली क्यों मनाऊँ ?
झूठी खुशियाँ किसको दिखाऊं !
खुश हूँ मैं ये क्यूँ बताऊँ !!

‪#‎आदित्य_प्रताप_सिंह 'अनु'

Tuesday, 9 February 2016

अपने



खाई पाटने का काम दिया था जिनको ,
उनने ही इसमें और गहराइयाँ बना दी !!
जिन "पेड़ो" को काटकर पुल बना देते.
उनको ही काटकर क्यों आग लगा दी !!
थोड़ी सी कोशिश से भर जाते सारे जख्म !
पर ,इन लोगो ने तो अपनी 'औकात' दिखा दी !!
हमने जिनको दी मांझा संभालने की जिम्मेदारी ,
ये क्या ! उनने ही हमारी पतंग काट दी
मेरी मोहब्बत छिनने का कसूर सिर्फ मेरा नहीं ,
कुछ मेरे 'अपने' भी हैं ,जिनने खुशियाँ छाँट दी !!

‪#‎आदित्य_प्रताप_सिंह 'अनु'

तेरा संग

तेरा संग

तेरी मौजूदगी मेरे लिए सुकून का अहसास है ,
जब तू पास है तो लगता है,
दुनिया मेरे पास है !
तेरा संग कितना है लुभाता ,
कैसे करूँ बयान ये कितना प्यारा अहसास है !
अब दुनिया इसे 'इश्क़' कहे तो क्या फर्क पड़ता है ,
अब उन मूर्खो को कौन समझाए ..!
ये तो उससे भी ख़ास है !!
जब तू होती है पास तो ख़ुशी सी मिलती है ..
तुझे पास आता देख मुस्कान खिलती है !!
भूल जाता हूँ सरे ग़मों को ..
जब तू हाथ में हाथ रखकर शांत रहने को कहती है !!
तेरा शान्त्वना भरा एक शब्द मेरे लिए काफी है ..
सदा तेरे पास मेरी हर गलती की माफ़ी है !!
पर जब तू दुखी होती है ..
मेरे सामने सन्नाटा सा जाता है
उन लम्हों को याद करके मेरा दिल आज भी सूख जाता है !
उन नैन अश्क़ो का निकलना भरी लग जाता है ,
समय आता है ....
जाता है..
पर दिल उन पलों को नहीं भूल पाता है !!
तेरे खिलाफ निकले एक एक शब्द का जवाब है मेरे पास
पर सिर्फ तुझसे किये वादों के चलते ये शक्श रुक जाता है !!
आज भी चाह लूँ ,
उन सबको ला दूँ तेरे कदमो के पास !
मत भूल...
आज भी मेरे समाने सारा समंदर सूख जाता है !
तुझे भी पाता है सेखियों की आदत नहीं है मुझे
पर लोगो की आदत से मेरा दिल भी घबराता है ..!
तू कहती है ध्यान मत दो,
पर ध्यान देकर उनका ध्यान और खिंच जाता है !!
तेरे लिए अकूत इज्जत है मेरे दिल में ...
इसलिए आज भी आशिक़ मिजाज तेरे सामने आने से कतराता है !
पता नहीं क्या रिश्ता था पिछले जन्म ,
जो मेरा दिल तुझे अपने इतना करीब पाता है
कोई रहे तेरे साथ रहे क्या पाता ,
पर अपनी दोस्ती की कसम ..
दूंगा हमेसा साथ ये वादा है !!
तू ठहरे मेरे संग कब तक पता नहीं ,
पर ये दोस्ती ठहरेगी सदा ये इरादा है !!
कभी दिल दुखाने का एक वादा है ,
क्यूंकि तेरा साथ मेरे लिए सबकुछ से ज्यादा है !!

‪#‎आदित्य_प्रताप_सिंह 'अनु'

Sunday, 7 February 2016

खो गया हूँ..!

खो गया हूँ..!
खुद का पता नहीं हैं
खुद में जो खो गया हूँ..!
तेरी बेरुखी से परेसां
जागे जागे सो गया हूँ।।
एक पैर कब्र पर है
एक तन्हाईयाँ है पकडे..!
या जी लूं इन्ही के संग मैं
या समझूँ की मर गया हूँ।।
सोचा था सारे लम्हे
बीतेंगे तेरे संग ही..!
बस इक पहर ही गया था
कोरा कागज जो हो गया हूँ।।
क्यों याद रहे हैं
'वो लम्हे' जो थे बीते!
जो टूट कर था चाहा
देख..अब तक मैं रिस रहा हूँ।।
जो बेतरतीबी थी मेरे दिल में,
तेरे लिए अये जानम..!
वो बेचैनी बन चुकी है
और मैं घुट घुट के जी रहा हूँ..!

आदित्य प्रताप सिंह।।